Gudi Padwa

India • March 19, 2026 • Thursday

75
Days
18
Hours
04
Mins
40
Secs
until Gudi Padwa
Asia/Kolkata timezone

Holiday Details

Holiday Name
Gudi Padwa
Country
India
Date
March 19, 2026
Day of Week
Thursday
Status
75 days away
About this Holiday
Gudi Padwa is a restricted holiday in India

About Gudi Padwa

Also known as: गुड़ी पड़वा

गुड़ी पड़वा: हिंदू नववर्ष और सांस्कृतिक चेतना का महापर्व

गुड़ी पड़वा भारत के सबसे जीवंत और महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है, जो मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गोवा और दमन के क्षेत्रों में अत्यंत उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार हिंदू चंद्र-सौर कैलेंडर के अनुसार चैत्र मास के पहले दिन यानी 'प्रतिपदा' को पड़ता है। यह न केवल एक नए वर्ष का आगमन है, बल्कि यह प्रकृति के पुनर्जन्म, वसंत ऋतु के स्वागत और मानवीय भावनाओं में नई आशाओं के संचार का प्रतीक है। गुड़ी पड़वा का अर्थ दो शब्दों से मिलकर बना है: 'गुड़ी' जिसका अर्थ है विजय पताका या ध्वज, और 'पड़वा' जिसका अर्थ है चंद्रमा के उज्ज्वल पखवाड़े का पहला दिन।

यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह सामाजिक एकता और पारिवारिक मेल-मिलाप का अवसर भी है। इस दिन चारों ओर एक नई ऊर्जा का अनुभव होता है। पेड़ों पर नई कोपलें आती हैं, फूलों की खुशबू हवाओं में घुल जाती है और लोग अपने घरों को स्वच्छ कर नए संकल्पों के साथ वर्ष की शुरुआत करते हैं। मराठा संस्कृति में इस दिन का स्थान सर्वोच्च है, क्योंकि यह उनके गौरवशाली इतिहास और आध्यात्मिक मान्यताओं को एक सूत्र में पिरोता है।

गुड़ी पड़वा का आध्यात्मिक महत्व गहरा है। इसे ब्रह्मांड के सृजन का दिन माना जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान ब्रह्मा ने इस सृष्टि की रचना की थी और समय चक्र का आरंभ किया था। इसलिए, यह दिन कृतज्ञता व्यक्त करने और जीवन के उपहार का सम्मान करने का समय है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत और अंधकार पर प्रकाश की विजय का संदेश देता है, जो हर भारतीय हृदय में आशा की किरण जगाता है।

2026 में गुड़ी पड़वा कब है?

वर्ष 2026 में, गुड़ी पड़वा का पावन पर्व Thursday, March 19, 2026 को मनाया जाएगा।

वर्तमान गणना के अनुसार, इस उत्सव के आगमन में अब केवल 75 दिन शेष हैं।

गुड़ी पड़वा की तिथि हर साल बदलती रहती है क्योंकि यह हिंदू चंद्र कैलेंडर (लुनीसोलर कैलेंडर) पर आधारित होती है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार, यह आमतौर पर मार्च के अंत या अप्रैल की शुरुआत में आता है। वर्ष 2026 में, प्रतिपदा तिथि 19 मार्च को सुबह 6:53 बजे प्रारंभ होगी और 20 मार्च को सुबह 4:52 बजे समाप्त होगी। परंपरा के अनुसार, सूर्योदय के समय मौजूद तिथि को ही उत्सव के लिए प्रधान माना जाता है, इसलिए 19 मार्च को ही मुख्य समारोह आयोजित किए जाएंगे।

ऐतिहासिक और आध्यात्मिक पृष्ठभूमि

गुड़ी पड़वा के साथ कई ऐतिहासिक कथाएँ और पौराणिक मान्यताएँ जुड़ी हुई हैं, जो इसे एक बहुआयामी त्योहार बनाती हैं:

1. सृष्टि की रचना और ब्रह्मा पुराण

ब्रह्म पुराण के अनुसार, सतयुग की शुरुआत इसी दिन हुई थी जब भगवान ब्रह्मा ने समय के साथ-साथ ब्रह्मांड का निर्माण किया था। उन्होंने इसी दिन से दिनों, हफ्तों, महीनों और वर्षों की गणना शुरू की थी। इसलिए, भक्त इस दिन ब्रह्मा जी की पूजा करते हैं ताकि उनका नया वर्ष ज्ञान और बुद्धि से परिपूर्ण हो।

2. भगवान राम का राज्याभिषेक

एक अन्य प्रमुख मान्यता के अनुसार, भगवान राम 14 वर्ष के वनवास के बाद रावण का वध करके अयोध्या लौटे थे। उनके आगमन और विजय की खुशी में अयोध्या वासियों ने विजय पताका फहराई थी। गुड़ी पड़वा उसी विजय उत्सव और भगवान राम के राज्याभिषेक की स्मृति में मनाया जाता है। यह अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक है।

3. छत्रपति शिवाजी महाराज की विजय

महाराष्ट्र के इतिहास में इस दिन का विशेष महत्व महान मराठा शासक छत्रपति शिवाजी महाराज से जुड़ा है। कहा जाता है कि उन्होंने अपनी विजय यात्राओं के बाद इसी दिन विजय ध्वज (गुड़ी) फहराने की परंपरा को सुदृढ़ किया था। मराठा योद्धा इस दिन को अपनी वीरता और गौरव के प्रतीक के रूप में देखते हैं।

4. शालिवाहन शक का आरंभ

इतिहासकारों के अनुसार, राजा शालिवाहन ने इसी दिन हूणों को पराजित किया था और एक नए कैलेंडर 'शालिवाहन शक' की शुरुआत की थी। यह कैलेंडर आज भी भारत के कई हिस्सों में आधिकारिक और धार्मिक कार्यों के लिए उपयोग किया जाता है।

गुड़ी पड़वा मनाने की पारंपरिक विधियाँ

गुड़ी पड़वा के दिन उत्सव की तैयारी सूर्योदय से पहले ही शुरू हो जाती है। इस दिन किए जाने वाले प्रमुख अनुष्ठान निम्नलिखित हैं:

घर की साफ-सफाई और सजावट

त्योहार से कुछ दिन पहले ही घरों की गहन सफाई की जाती है। लोग अपने घरों को धोते हैं और प्रवेश द्वार पर सुंदर 'रंगोली' बनाते हैं। रंगोली को समृद्धि का प्रतीक माना जाता है और ऐसा विश्वास है कि यह देवी लक्ष्मी को घर में आमंत्रित करती है। मुख्य द्वार पर आम के पत्तों और गेंदे के फूलों का तोरण बांधा जाता है।

गुड़ी का निर्माण और स्थापना (गुड़ी ध्वज)

इस त्योहार का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा 'गुड़ी' खड़ी करना है। एक लंबी बांस की छड़ी ली जाती है, जिसके ऊपरी सिरे पर एक चमकीले पीले या हरे रंग की रेशमी साड़ी या धोती बांधी जाती है। इसके ऊपर नीम के पत्ते, आम के पत्ते और फूलों की माला चढ़ाई जाती है। इसके बाद, छड़ी के शीर्ष पर तांबे, चांदी या पीतल का एक उल्टा लोटा (पात्र) रखा जाता है। यह गुड़ी घर की खिड़की या छत पर ऐसी जगह लगाई जाती है जहाँ से हर कोई इसे देख सके। यह गुड़ी 'धर्मध्वज' कहलाती है, जो सौभाग्य और विजय का संकेत है।

नीम और गुड़ का सेवन

गुड़ी पड़वा की एक अद्वितीय परंपरा नीम की पत्तियों और गुड़ का मिश्रण खाना है। नीम की कड़वाहट और गुड़ की मिठास का यह मिश्रण जीवन के उतार-चढ़ाव (सुख और दुख) का प्रतीक है। आयुर्वेद के अनुसार, वसंत ऋतु में नीम का सेवन रक्त को शुद्ध करता है और प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाता है।

पारंपरिक व्यंजन

मराठी परिवारों में इस दिन विशेष पकवान बनाए जाते हैं। 'पूरन पोली' (चने की दाल और गुड़ से भरी मीठी रोटी) इस दिन का मुख्य आकर्षण होती है। इसके अलावा श्रीखंड, पूरी और 'कणगी' (एक प्रकार की खीर) भी बनाई जाती है। कोंकणी समुदायों में 'कणग्याची खीर' प्रसिद्ध है।

सामाजिक और सामुदायिक उत्सव

गुड़ी पड़वा केवल व्यक्तिगत पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक सामुदायिक उत्सव है:

  1. शोभा यात्रा: महाराष्ट्र के शहरों जैसे मुंबई, पुणे और नागपुर में भव्य 'शोभा यात्राएं' निकाली जाती हैं। इन यात्राओं में लोग पारंपरिक परिधानों (पुरुष कुर्ता-पायजामा और महिलाएं नौवारी साड़ी) में सज-धज कर शामिल होते हैं। ढोल-ताशा पथक की थाप पर युवा और बुजुर्ग सभी थिरकते हैं।
  2. लेझिम नृत्य: समुदायों द्वारा पारंपरिक 'लेझिम' नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है, जो शारीरिक स्फूर्ति और समन्वय का अद्भुत उदाहरण है।
  3. दीया विसर्जन: त्योहार की पूर्व संध्या पर, कई समुदायों में नदियों या जलाशयों के पास जाकर मिट्टी के दीये जलाने और उन्हें पत्तों पर रखकर पानी में प्रवाहित करने की परंपरा है। यह शांति और पवित्रता का प्रतीक है।
  4. पारिवारिक मिलन: इस दिन विवाहित बेटियों और उनके पतियों को दोपहर के भोजन के लिए आमंत्रित करना एक पुरानी और सम्मानित परंपरा है। यह पारिवारिक बंधनों को मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है।

चैत्र नवरात्रि के साथ संबंध

गुड़ी पड़वा का दिन 'चैत्र नवरात्रि' के नौ दिवसीय उत्सव के आरंभ का भी प्रतीक है। इस दिन से भक्त देवी दुर्गा की उपासना शुरू करते हैं और नौ दिनों तक उपवास रखते हैं। यह समय आध्यात्मिक शुद्धि और आत्म-अनुशासन का होता है। महाराष्ट्र में, कई लोग इस दिन 'घटस्थापना' भी करते हैं।

विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नाम

भारत की विविधता इस त्योहार के विभिन्न नामों में भी झलकती है: उगादि: आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में इसे 'उगादि' के रूप में मनाया जाता है। चेटी चंड: सिंधी समुदाय इस दिन को अपने इष्ट देव झूलेलाल के जन्मदिन और नववर्ष के रूप में मनाते हैं। नवरेह: कश्मीरी पंडित इसे 'नवरेह' के नाम से मनाते हैं। साजिबू नोंगमा पानबा: मणिपुर में इसे इसी नाम से नववर्ष के रूप में मनाया जाता है।

व्यावहारिक और ज्योतिषीय जानकारी

हिंदू पंचांग के अनुसार, गुड़ी पड़वा 'साढ़े तीन मुहूर्तों' में से एक माना जाता है। हिंदू संस्कृति में कुछ विशेष दिन ऐसे होते हैं जिन्हें इतना शुभ माना जाता है कि किसी भी नए कार्य को शुरू करने के लिए पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं होती। गुड़ी पड़वा उनमें से एक है।

लोग इस दिन नए व्यवसाय शुरू करना, सोना खरीदना, नया घर (गृह प्रवेश) लेना या वाहन खरीदना बहुत शुभ मानते हैं। ज्योतिषीय रूप से, इस दिन सूर्य अपनी उच्च राशि मेष में प्रवेश करने की प्रक्रिया शुरू करता है, जो ऊर्जा और जीवन शक्ति का संचार करता है।

क्या गुड़ी पड़वा पर सार्वजनिक अवकाश होता है?

हाँ, भारत में गुड़ी पड़वा का महत्व इतना अधिक है कि इसे आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त है:

  1. प्रतिबंधित अवकाश (Restricted Holiday): केंद्र सरकार के कार्यालयों के लिए यह आमतौर पर एक प्रतिबंधित अवकाश होता है, जिसका अर्थ है कि कर्मचारी अपनी पसंद के आधार पर छुट्टी ले सकते हैं।
  2. सार्वजनिक अवकाश (Public Holiday): महाराष्ट्र और गोवा जैसे राज्यों में, यह एक पूर्ण सार्वजनिक अवकाश होता है। इस दिन इन राज्यों में सभी सरकारी कार्यालय, स्कूल, कॉलेज और अधिकांश निजी संस्थान बंद रहते हैं।
  3. बाजार और व्यापार: हालांकि सरकारी संस्थान बंद रहते हैं, लेकिन बाजार बहुत सक्रिय होते हैं। खरीदारी के लिए यह साल के सबसे बड़े दिनों में से एक होता है, इसलिए दुकानों पर भारी भीड़ देखी जा सकती है। सार्वजनिक परिवहन (बसें, ट्रेनें) संचालित होते हैं, लेकिन उत्सवों और जुलूसों के कारण कुछ सड़कों पर यातायात मार्ग परिवर्तित किया जा सकता है।

निष्कर्ष

गुड़ी पड़वा केवल कैलेंडर बदलने का दिन नहीं है, बल्कि यह अपनी जड़ों की ओर लौटने, अपनी संस्कृति पर गर्व करने और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने का दिन है। नीम की कड़वाहट से लेकर पूरन पोली की मिठास तक, यह त्योहार हमें जीवन को उसकी संपूर्णता में स्वीकार करना सिखाता है। 2026 में जब आप गुड़ी फहराएं, तो याद रखें कि यह ध्वज आपकी व्यक्तिगत प्रगति, आपके परिवार की सुख-शांति और राष्ट्र की समृद्धि का प्रतीक है।

यह पावन पर्व हमें सिखाता है कि हर अंत एक नई शुरुआत है। जैसे पतझड़ के बाद वसंत आता है, वैसे ही हर कठिनाई के बाद सफलता का उदय होता है। गुड़ी पड़वा के इस शुभ अवसर पर, आइए हम सब मिलकर एक ऐसे समाज के निर्माण का संकल्प लें जो प्रेम, सद्भाव और न्याय पर आधारित हो।

आप सभी को आगामी गुड़ी पड़वा और हिंदू नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ!

Frequently Asked Questions

Common questions about Gudi Padwa in India

साल 2026 में गुड़ी पड़वा का पावन पर्व March 19, 2026 को मनाया जाएगा। इस वर्ष यह त्योहार Thursday के दिन पड़ रहा है। आज से इस उत्सव के आने में 75 दिन शेष हैं। हिंदू चंद्र-सौर कैलेंडर के अनुसार, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को यह त्योहार मनाया जाता है, जो नए साल की शुरुआत का प्रतीक है। महाराष्ट्र और कोंकण क्षेत्र में इस दिन का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है।

हाँ, भारत में गुड़ी पड़वा को एक प्रतिबंधित अवकाश (Restricted Holiday) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इसका अर्थ है कि महाराष्ट्र और गोवा जैसे राज्यों में, जहाँ यह त्योहार प्रमुखता से मनाया जाता है, सरकारी कार्यालयों और स्कूलों में छुट्टी होती है। अन्य राज्यों में, कर्मचारी अपनी पसंद के अनुसार इस दिन छुट्टी ले सकते हैं। यह दिन मुख्य रूप से मराठी और कोंकणी समुदायों के लिए नए साल के उत्सव का आधिकारिक अवकाश होता है।

गुड़ी पड़वा के साथ कई पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं। माना जाता है कि इसी दिन भगवान ब्रह्मा ने ब्रह्मांड की रचना की थी। एक अन्य मान्यता के अनुसार, यह दिन भगवान राम के 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या वापसी और उनके राज्याभिषेक का उत्सव है। ऐतिहासिक रूप से, यह छत्रपति शिवाजी महाराज की विजय और शालिवाहन शक कैलेंडर की शुरुआत का भी प्रतीक है। आध्यात्मिक रूप से, यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत और वसंत ऋतु के आगमन के साथ नए जीवन की शुरुआत का संदेश देता है।

उत्सव की शुरुआत घरों की गहरी सफाई और प्रवेश द्वार पर सुंदर रंगोली बनाने से होती है। लोग नए कपड़े पहनते हैं और अपने घरों के बाहर 'गुड़ी' फहराते हैं। गुड़ी एक रेशमी कपड़े (साड़ी या धोती), फूलों की माला, नीम के पत्तों और आम के पत्तों से बनी होती है, जिसके ऊपर तांबे या चांदी का लोटा उल्टा रखा जाता है। परिवार भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं, मंदिरों के दर्शन करते हैं और अपने रिश्तेदारों, विशेषकर विवाहित बेटियों और उनके पतियों को भोजन पर आमंत्रित करते हैं।

गुड़ी पड़वा के अवसर पर 'पूरन पोली' सबसे प्रमुख व्यंजन है, जो चने की दाल और गुड़ से भरी एक मीठी रोटी होती है। इसके अलावा, श्रीखंड और पूरी भी बड़े चाव से बनाई और खाई जाती है। एक विशेष परंपरा नीम के पत्तों और गुड़ का मिश्रण खाने की है, जो जीवन के कड़वे और मीठे अनुभवों के संतुलन का प्रतीक है। यह मिश्रण स्वास्थ्य के लिए भी बहुत लाभकारी माना जाता है क्योंकि यह शरीर को शुद्ध करने में मदद करता है।

गुड़ी का अर्थ है 'विजय ध्वज'। इसे घर के दाहिनी ओर ऊंचे स्थान पर लगाया जाता है ताकि यह दूर से दिखाई दे। यह सौभाग्य, समृद्धि और बुराई पर जीत का प्रतीक माना जाता है। गुड़ी में इस्तेमाल होने वाले नीम के पत्ते आरोग्य का, आम के पत्ते पवित्रता का और उल्टा रखा बर्तन ईश्वरीय शक्ति का प्रतीक है। मान्यता है कि गुड़ी लगाने से घर में नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश नहीं करती और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।

जी हाँ, गुड़ी पड़वा का दिन ही चैत्र नवरात्रि के नौ दिवसीय उत्सव की शुरुआत का प्रतीक है। इसी दिन से भक्त देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा और उपवास शुरू करते हैं। महाराष्ट्र में जहाँ इसे गुड़ी पड़वा कहा जाता है, वहीं भारत के अन्य हिस्सों में इसे अलग नामों से जाना जाता है, जैसे दक्षिण भारत में 'उगादी' और सिंधी समुदाय में 'चेटी चंड'। यह पूरा समय आध्यात्मिक शुद्धि और शक्ति की उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

यदि आप इस दौरान महाराष्ट्र की यात्रा कर रहे हैं, तो आपको स्थानीय समुदायों द्वारा आयोजित भव्य शोभा यात्राएं (सांस्कृतिक परेड) देखने को मिलेंगी। लोग पारंपरिक वेशभूषा, जैसे नौवारी साड़ी और फेटा (पगड़ी) पहनकर ढोल-ताशों की थाप पर नाचते हैं। शहरों में सुबह-सुबह निकलने वाली ये रैलियां जीवंत संस्कृति का दर्शन कराती हैं। पर्यटकों को घरों के बाहर सजी रंगीन रंगोलियां और ऊँची फहराती गुड़ी देखने का अवसर मिलता है, जो भारतीय आतिथ्य और परंपरा का अनूठा अनुभव प्रदान करती हैं।

Historical Dates

Gudi Padwa dates in India from 2010 to 2025

Year Day of Week Date
2025 Sunday March 30, 2025
2024 Tuesday April 9, 2024
2023 Wednesday March 22, 2023
2022 Saturday April 2, 2022
2021 Tuesday April 13, 2021
2020 Wednesday March 25, 2020
2019 Saturday April 6, 2019
2018 Sunday March 18, 2018
2017 Tuesday March 28, 2017
2016 Friday April 8, 2016
2015 Saturday March 21, 2015
2014 Monday March 31, 2014
2013 Thursday April 11, 2013
2012 Friday March 23, 2012
2011 Monday April 4, 2011
2010 Tuesday March 16, 2010

Note: Holiday dates may vary. Some holidays follow lunar calendars or have different observance dates. Purple indicates weekends.